
भारत का पर्थ में प्रदर्शन आलोचकों की उम्मीद के विपरीत अच्छा ही रहा। अगर गांगुली और लक्ष्मण ने विकेट न थ्रो किए होते तो शायद ऑस्ट्रेलिया की चंडाल चौकड़ी को नानी याद आ जाती।
सचिन की बल् लेबाजी ओह सचमुच लाजवाब रही। ब्रेट ली ने तो बाउंसर सचिन को चमड़े की गंध सुंघाने के लिए फेका। लेकिन मास्टर ब्लॉस्टर ने उसे बल्ले से यूं नायाब अंदाज में मारा की गिली समेत सारे स्लिप के फिल्डर हाथ मलते ही रह गए। 71 रन की यह पारी सचमुच बेजोड़ थी। हालात के अनुसार तो सिडनी और मेलबोर्न से भी बेहतर।
कहां है इयान चैपल जो कल तक उन्हें संन्यास लेने की सीख दे रहे थे। आज सचिन उन्हीं के मैदानों में पूरी लय में है। काश सचिन को रऊफ ने बख्श दिया होता। लेकिन रऊफ और बोडेन ने सचमुच शानदार अंपायरिंग की। द्रविड़ को एक संदेह का लाभ भी मिला। लेकिन यह खिलाड़ी फिर शतकों की सिल्वर जुबली से चूक ही गया।
अंतिम समय में अगर लक्ष्मण-द्रविड़ जमे रहते तो खुदा न जाने ऑस्ट्रेलियाईयों का क्या हाल होता कल। कोलकाता 2001 भूले नहीं हैं कंगारु। भारत के खिलाफ हमेशा खतरा महसूस करने वाले ये विश्व चैंपियन सिडनी में कैसे जीते दुनिया से छुपा नहीं। फिर इनका विजयी रथ रोकने लक्ष्मण से कम से कम शतक की दरकार तो थी ही।
कल अगर 100 रन भी और बन गए तो भारत अच्छी स्थित में होगा। हालांकि यह अब मुश्किल ही लगता है। अब सारा दारोमदार गेंदबाजों पर है।
ईशांत-इरफान-आरपी अजीत अगरकर के एडिलेड में 2003-04 के प्रदर्शन की वीडियो टेप देखो भाई और कर दिखाओ कुछ खास। अगर आगरकर कर सकता है तो तुम क्यों नहीं।
2 comments:
this is a good article.there is no doubt that sachin is a great plyaer.but if he played good innings after 20 or 25 innings that is not his greatness.
Dear chatan u cant say so. see his record. I think he was most run getter in test match with Ganguly after world cup debacal
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